लो मशालों को जगा डाला किसी ने
भोले थे अब कर दिया भाला किसी ने
है शहर ये कोयलों का
ये मगर ना भूल जाना
लाल शोले भी इसी बस्ती में रहते है युगों से
रास्तो मे धूल है
कीचड़ भी है पर ये याद रखना
ये ज़मीं धुलती रही
संक्लप वाले आंसुओं से
मेरे आंगन को है धो डाला किसी ने
लो मशालों को जगा डाला किसी ने
भोले थे अब कर दिया भाला किसी ने
आग बेवजह कभी घर से निकलती ही नही है
टोलियां जत्थे बनाकर चीख यूं चलती नही है
रात को भी देखने दो आज तुम सुरज के जलवे
जब तपेगी ईट तब ही होश में आयेंगे तलवे
तोड़ डाला मौन का ताला किसी ने
लो मशालों को जगा डाला किसी ने
भोले थे अब कर दिया भाला किसी ने
– Prasoon Joshi
Reference Link: http://indiatoday.intoday.in/site/video/prasoon-joshi-poem-against-corruption/1/148420.html




